तनवीर
मिट्टी के दीए, बर्तन ओर लक्ष्मी गणेश दे रहे चाइनीज उत्पादों को टक्कर
हरिद्वार, 16 अक्तूबर। दीपावली पर्व के नजदीक आते ही कुम्हार समाज पारंपरिक मिट्टी के बर्तन, दीये, और गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों को तैयार करने में दिन-रात जुट गया है। आधुनिकता और चाइनीज उत्पादों की सस्ती कीमतों के बावजूद, कुम्हार समाज अपनी पारंपरिक कला के जरिए बाजार में अपनी जगह बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
वोकल फॉर लोकल का असर
कुम्हार व्यवसायी कृष्ण कुमार, राजेंद्र, सोहनलाल और संजय ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के वोकल फॉर लोकल अभियान से मिट्टी के बने दीयों और मूर्तियों की मांग में उत्साहजनक वृद्धि हुई है। फिर भी चाइनीज उत्पादों की सस्ती कीमतों के कारण प्रतिस्पर्धा कठिन बनी हुई है। उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीये और बर्तन तैयार करने में बहुत मेहनत और लागत लगती है। लेकिन परंपरागत पूजा अर्चना करने वाले उपभोक्ता अब भी कच्ची मिट्टी के बर्तन और कुल्हड़ को प्राथमिकता देते हैं।
तीन पीढ़ियों की मेहनत लेकिन घटती रुचि
कृष्ण कुमार ने बताया कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से इस व्यवसाय में लगा हुआ है। हालांकि, आज की युवा पीढ़ी इस व्यवसाय में रुचि नहीं ले रही है। उन्होंने कहा मिट्टी महंगी मिलती है, और मेहनत की तुलना में आमदनी कम है। सरकार को कुम्हारों के व्यवसाय को बढ़ावा देने और उनकी आय में सुधार के लिए प्रचार-प्रसार करना चाहिए।
चाइनीज उत्पादों पर रोक की मांग
कुम्हार समाज ने चाइनीज उत्पादों पर रोक लगाने की मांग भी की है, ताकि उनके पारंपरिक व्यवसाय को सहारा मिल सके। उनका कहना है कि मिट्टी के दीये, कुल्हड़ और मूर्तियां न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा भी हैं।
दीपावली पर बढ़ी मांग
दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीयों, भगवान की मूर्तियों और कुल्हड़ों की बिक्री चरम पर होती है। कुम्हार समाज का कहना है कि अगर सरकार इस व्यवसाय को समर्थन दे और चाइनीज उत्पादों की बिक्री पर सख्ती करे, तो यह व्यवसाय फिर से अपनी खोई हुई रौनक वापस पा सकता है।


