हरिद्वार, 26 मार्च। वन्य जीवन विशेषज्ञ व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं कुल सचिव दिनेशचंद्र भट्ट ने बताया कि उत्तराखंड के जंगलों में वर्तमान में 2275 से अधिक गुलदार हैं। यह संख्या उत्तराखंड के जंगलों की धारण क्षमता से कई गुना अधिक है। एक गुलदार का होम रेंज यानी शिकार करने की टेरिटरी लगभग 30 से 50 वर्ग किमी है। उत्तराखंड का वर्तमान में फॉरेस्ट कवर 24686 वर्ग किमी है। इस हिसाब से उत्तराखंड के जंगलों में लगभग 500 गुलदार ही ठीक से रह सकते हैं। शेष 1700 गुलदार जंगली क्षेत्र से बाहर ग्रामीण व शहरी अंचलों, स्क्रब फॉरेस्ट और एग्रीकल्चर फील्ड में भ्रमण करते रहते हैं।
जिस कारण मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं।
प्रोफेसर दिनेश चंद्र भट्ट ने बताया कि टीम के साथ टिहरी जिले के विस्तृत सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि जिले में विगत 10 वर्षों में प्रतिवर्ष तीन व्यक्ति गुलदार द्वारा मारे गए और 7 व्यक्ति घायल हुए। इसी तरह प्रतिवर्ष भालू द्वारा औसतन एक व्यक्ति मारा गया और सात व्यक्ति घायल हुए। वर्ष 2021 और 22 यानी 2 वर्षों का आकड़ों से पता चलता है कि 172 पालतू पशु गुलदार द्वारा मारे गए। पौड़ी गढ़वाल में सन 2025 में ही 15 से अधिक व्यक्ति गुलदार द्वारा मारे गए और विगत पांच वर्षों में गुलदार ने 27 लोगों की जान ली है।
डा.दिनेश भट्ट की टीम को शोध सर्वे में 65 प्रतिशत लोगों ने विदेशी वनस्पति लेनटाना झाड़ी के अत्यधिक फैलाव को वन्य जीव संघर्ष का मुख्य कारण बताया। शेष लोगों ने विकास कार्य एवं जंगल की आग को मानव वन्य जीव संघर्ष का संभावित कारण बताया। डा. दिनेश भट्ट ने बताया कि पौड़ी गढ़वाल के लगभग हर दूसरे तीसरे गांव में एक दर्जन से अधिक जंगली सूअर, लगभग दो दर्जन बंदर और इतनी ही संख्या में मोर खेतों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और इनसे निपटने का कोई उपाय सरकार की तरफ से नहीं बताया गया है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड के 3940 गांव में एक भी इंसान नहीं रहता।
पलायन, गैस की उपलब्धता और पशुपालन में अत्यधिक कमी के कारण ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता काफी कम हो गई है। जिससे बंजर खेत भी अब जंगल में परिवर्तित हो रहे हैं और सर्वत्र जंगल एवं बंजर जमीन पर विदेशी लांटना झाड़ी खूब फल फूल रही है और गुलदार व अन्य जंगली जानवरों को छिपने के लिए मुफीद जगह प्रदान कर रही है। डा.दिनेश भट्ट ने बताया कि यह कहना गलत है कि गढ़वाल मे सघन वनों की कमी और जंगल मे गुलदार को भोजन की कमी है।
भारतीय सर्वेक्षण विभाग के आंकड़े बताते है की गढ़वाल मे विगत 10 वर्षाे मे सघन वनों का क्षेत्रफल बढ़ गया है और जंगल मे बन्दर, लंगूर, काकड़, मोर व अन्य जीवो की संख्या कई गुना बढ़ गई है। पौड़ी गढ़वाल के ग्राम भटगांव के मूल निवासी डा.दिनेश भट्ट की शोध टीम में जयहरिखाल पीजी कालेज के डा. मोहन कुकरेती, उत्तराखंड संस्कृत वि.वि. के डा.विनय सेठी, पतंजलि विवि. के डा.रोमेश, डोईवाला पीजी कालेज के डा.त्रिभुवन, ग्राफिक एरा यूनि. के डा.आशीष, रुड़की से डा. विकास सैनी आदि शामिल रहे। यह शोध रूस की वैज्ञानिक पत्रिका बायोलॉजी बुलेटिन में प्रकाशित हुआ है।


