उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का 21वां स्थापना दिवस:

Haridwar News
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संस्कृत को रोज़गार से जोड़ना आवश्यक- त्रिवेन्द्र सिंह रावत –
हरिद्वार। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का 21 वां स्थापना दिवस समारोह भव्य और गरिमामय वातावरण में आयोजित हुआ। दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ ।अतिथियों का स्वागत भाषण विश्वविद्यालय की प्रो० विन्दुमती द्विवेदी ने दिया। उन्होंने कहा कि यह अवसर केवल विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस का औपचारिक कार्यक्रम नहीं है,बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और संस्कृत भाषा के वैश्विक महत्व को पुनः स्थापित करने का है।

विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के शुभ अवसर पर “केदार मानस पंचांग’ का लोकार्पण किया गया,ख्याति प्राप्त ज्योतिषाचार्यों के निर्देशन में तैयार यह पंचांग धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड प्राचीन काल से ही ज्योतिष और संस्कृत विद्या की भूमि रहा है और यह पंचांग उस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करेगा। इसके साथ ही विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका ‘शोध प्रज्ञा’ के माध्यम से ज्ञान-विस्तार के प्रयासों को भी रेखांकित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत रहे, जबकि विशिष्ट अति विशिष्ट अतिथि कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक, रानीपुर विधायक आदेश चौहान, संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ग़ैरोला रहे।
अपने संबोधन में वक्ताओं ने कहा कि 21 वर्ष किसी भी संस्थान के लिए युवावस्था का प्रतीक होता है। गंगा तट पर स्थित यह विश्वविद्यालय अब अपनी पूर्ण क्षमता के साथ आगे बढ़ रहा है और न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे विश्व को भारतीय ज्ञान परंपरा से आलोकित कर रहा है। संस्कृत को केवल कर्मकांड की भाषा मानने की धारणा को खारिज करते हुए इसे विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र और आधुनिक तकनीक से जुड़ी भाषा बताया गया।
मुख्य अतिथि त्रिवेंद्र सिंह रावत ने संस्कृत को “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना का आधार बताते हुए कहा कि यह भाषा विश्व को जोड़ने की क्षमता रखती है। उन्होंने बताया कि आज दुनिया के कई देशों में संस्कृत के अध्ययन के प्रति रुचि बढ़ रही है और विदेशों में भी इसके माध्यम से रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक शोध के साथ संस्कृत को जोड़कर इसे और अधिक प्रासंगिक बनाया जा सकता है।
कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृत का व्यापक विकास तभी संभव है जब इसे रोजगार से जोड़ा जाए। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे संस्कृत के अध्ययन को अपनाएं और इसे आधुनिक जीवन में उपयोगी बनाएं। उन्होंने हरिद्वार और ऋषिकेश को संस्कृत नगरी के रूप में विकसित करने की योजना का भी उल्लेख किया, जिससे आने वाले समय में यहां संस्कृत का वातावरण और सुदृढ़ होगा।
कार्यक्रम में संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार कैरोलाइना ने कहा कि राज्य सरकार संस्कृत के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है। प्रदेश में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है और प्रत्येक जिले में ‘संस्कृत ग्राम’ स्थापित करने की पहल की गई है। इसके साथ ही आगामी कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार और ऋषिकेश क्षेत्र को संस्कृतमय बनाने की योजना पर भी कार्य किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर रमाकान्त पाण्डेय ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कहा कि संस्कृत भाषा में अपार ज्ञान सन्नहित है। उसको जनमानस के सामने प्रकाशित करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय इस भूमिका को ज़िम्मेदारी के साथ निभा रहा है ।प्रोफ़ेसर लक्ष्मी नारायण जोशी ने नई शिक्षा नीति के तहत संस्कृत को डिजिटल लर्निंग, तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास से जोड़ने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। आईआईटी रुड़की के साथ सहयोग, मंत्र चिकित्सा पर शोध, तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत के प्रचार-प्रसार की योजनाएं भी साझा की गईं। इसके अलावा योग, ज्योतिष, श्रीमद्भागवत और तीर्थाटन से जुड़े नए पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा की गई।
समारोह में प्रोफ़ेसर भोलानाथ झा , आचार्य कीर्ति वल्लभ शक्टा एवं आचार्य रामचंद्र बैजापुरकर तथा विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। वक्ताओं ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि संस्कृत के माध्यम से वे न केवल अपने करियर को संवार सकते हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा को भी विश्व स्तर पर स्थापित कर सकते हैं।
इस अवसर पर यह भी प्रस्ताव रखा गया कि स्थापना दिवस समारोह को भविष्य में तीन दिवसीय कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया जाए, ताकि अधिक से अधिक लोग इसमें सहभागिता कर सकें। साथ ही संस्कृत संभाषण शिविर, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की योजना पर भी चर्चा हुई।संचालन और संयोजन डॉ० कंचन तिवारी ने किया।कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के कुलसचिव दिनेश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया ।इस अवसर पर लंदन से पधारे दिवाकर शुक्ल , प्रोफ़ेसर आर ० एवं ० यादव पूर्व कुलपति, पूर्णिया विश्वविद्यालय, बिहार, देशराज शर्मा , गौरव शास्त्री, प्रोफ़ेसर दिनेश चमोला, प्रोफ़ेसर मोहन चंद्र बलोदी,प्रोफ़ेसर अरविंद नारायण मिश्र सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे ।

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