पतंजलि विवि में आयोजित ताइवान के प्रशिक्षुओं का छह दिवसीय शिविर संपन्न

Haridwar News
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तनवीर
हरिद्वार, 04 अप्रैल। पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित ताइवान के प्रशिक्षुओं के छह दिवसीय इंटीग्रेटेड योग एवं आयुर्वेद प्रशिक्षण शिविर के समापन पर यज्ञ एवं उपनयन संस्कार का आयोजन किया गया। सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। प्रशिक्षणार्थियों ने संस्कृत भाषा में योगसूत्र की सुंदर प्रस्तुति दी।
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति योग गुरू स्वामी रामदेव ने ताइवान से आए योग प्रशिक्षुओं को भारत की वैदिक परंपराओं एवं उपचार पद्धतियों के बारे में अवगत कराया। साथ ही उन्होंने योग और आयुर्वेद के माध्यम से समग्र विश्व के कल्याण, भारत के महत्व और प्रचार-प्रसार हेतु आशीर्वचन प्रदान किए।
शिविर में प्रतिभागियों को योग, ध्यान, प्राणायाम, पंचकर्म, षटकर्म, आयुर्वेदिक आहार-विज्ञान, जीवनशैली सिद्धांत और समग्र स्वास्थ्य विज्ञान का वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र, आसन, मुद्रा, बंध और मर्म चिकित्सा के संबंध में भी जानकारी दी गयी। समापन कार्यक्रम में मानविकी एवं प्राच्य विद्या संकाय की अध्यक्ष साध्वी डा.देवप्रिया ने बताया कि योग की भूमिका ध्यान, प्राणायाम, आयुर्वेद, स्वस्थ, संतुलित और जागरूक बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पतंजलि अपने स्तर पर यह प्रयास करता है कि वेद एवं उपनिषदों के ज्ञान के प्रचार के माध्यम से वर्तमान डिजिटल युग में मानवता की सेवा की जाए। उन्होंने कहा कि यज्ञ के माध्यम से प्रकृति को शुद्ध करना और संतुलित प्राणायाम के द्वारा तंत्रिकाओं को शांत रखना ये सभी सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने के अनिवार्य तरीके हैं। प्रतिकुलपति प्रो.मयंक अग्रवाल ने प्रशिक्षुओं को उत्तम भविष्य की शुभकामनाएं देते हुए बताया कि डा.प्रो.वी.के. कटियार का ताइवान के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं कार्यक्रम की संकल्पना के लिए विशेष योगदान रहा।

समापन कार्यक्रम में पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा.दीपेश सक्सेना, शिक्षण और शोध संकायाध्यक्ष डा.ऋत्विक सहाय बिसारिया, प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग विज्ञान के संकायाध्यक्ष डा.तोरण सिंह, कुलानुशासक स्वामी आर्षदेव, उपकुलसचिव डा.निर्विकार, डा. आरती पाल मौजूद रहे। शिविर में डा.आरती पाल ने प्रशिक्षण समन्वयक की प्रमुख भूमिका निभाई। शिविर में पतंजलि वेलनेस टीम और पतंजलि विश्वविद्यालय के शिक्षकों का योगदान उल्लेखनीय रहा।

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