मोबाइल नहीं अखबार है ज्ञान का माध्यम-अनिल आत्रेय
न्यूज पेपर का दाम एक तंबाकू की पुड़िया से भी कम है-अश्वनी शर्मा
हरिद्वार, 28 अगस्त। इंटरनेट और मोबाइल के इस दौर में भी अखबार की प्रासंगिकता आज भी सबसे अधिक है। आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो टेलीविजन और नेट के युग में समाचारों और खबरों की पुष्टि के लिए अखबार जरूर पढ़ते हैं। 1972 से लोगों के दरवाजे तक अखबार की दस्तक पहुंचा रहे, आत्रेय न्यूज एजेंसी के स्वामी अनिल आत्रेय ने ज्ञान के क्षेत्र में अखबार की भूमिका पर अपने विचार साझा करते हुए बताया कि मोबाइल से सत्यता का ज्ञान नहीं मिलता।
अखबार ही सत्यता को दर्शाने का सबसे सशक्त माध्यम है। रोजाना अखबार पढ़ने से करंट अफेयर्स, विज्ञान, खेल, राजनीति, आर्थिक, सामाजिक और देश-दुनिया की तमाम जानकारी मिलती है। अखबार से कंटेंट, संपादकीय और पुरानी-नई चीजों का ज्ञान प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि एक समय था जब टाइम्स ऑफ इंडिया स्कूल-कालेज में पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता था।
हिंदी में अमर उजाला, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, जनसत्ता आदि अखबार घर-घर पढ़े जाते थे। लोग नंदन, पराग, कॉम्पिटिशन सक्सेस, विज्ञान प्रगति, कॉम्पिटिशन साइंस रिव्यू आदि मैगजीन में रुचि लेते थे। एक जमाने में विज्ञान प्रगति 75 पैसे में मिलती थी, आज उसका दाम 75 रुपये हो चुका है। एक दौर था जब अखबार 12 पैसे, 15 पैसे, 25 पैसे में मिलता था। उन्होंने बताया कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर युवाओं को अखबार जरूर पढ़ना चाहिए। प्रतिदिन अखबार पढ़ने से देश दुनिया की तमाम जानकारी अपडेट होती है।
जिसका लाभ प्रतियोगी परीक्षा मिलता है। अखबारों से ज्ञान लेकर लोग आज उच्च पदों पर नौकरियां कर रहे हैं। अखबार पढ़ने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है। अखबार सूचनाओं का भी सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी मोबाइल और सोशल मीडिया के भ्रमजाल में फंस रही है। पढ़ाई करने से ही कैरियर बनाता है। जो ज्ञान किताबों, अखबारों और पत्रिकाओं से मिल सकता है। वह मोबाइल और सोशल मीडिया नहीं मिलेगा।
वैज्ञानिक अध्ययनों में पुष्टि हुई है कि डिजिटल सामग्री के बजाए मुद्रित सामग्री को मानव मस्तिष्क अधिक आसानी से याद रखता है। आत्रेय ने कहा कि मौसम कैसा भी हो, अखबार लोगों के घरों तक पहुंचाना हमारा लक्ष्य है। सर्दी, गर्मी, बरसात सभी झेलनी पड़ती है लेकिन अखबार नहीं रुकता। कागजों की कमी के कारण 1977 में सोमवार को अखबार नहीं छपता था, तब हमारी भी छुट्टी होती थी। उन्होंने बताया कि उनकी तीसरी पीढ़ी अखबार वितरण काम कर रही है।
आज भी कई पाठक ऐसे हैं जो लगातार 50 वर्षों से अखबार पढ़ रहे हैं और उनका बिल आज भी 3000 रुपये के करीब होता है। एक पाठक जयकुमार 1977 से निरंतर अखबार पढ़ रहे हैं। अश्वनी शर्मा ने कहा कि आज अपराध की खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है। आत्महत्या जैसी घटनाओं को लीड समाचार बनाना तर्कसंगत नहीं है। अखबार से मिले ज्ञान से जीवन में बदलाव लाता है। न्यूज पेपर का दाम एक तंबाकू की पुड़िया से भी कम है। अखबारों के माध्यम से ही देश की आजादी का बिगुल भी बजा था। चिंता का विषय है कि सरकारी दफ्तरों, बैंकों, स्कूल-कालेजों में अखबारों की संख्या घट रही है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को अखबार पढ़ने में रूचि लेनी चाहिए।
अखबार ज्ञान का भंडार और मनोरंजन का सबसे सस्ता माध्यम है। अखबार कभी बेकार नहीं जाता है। अखबार की रद्दी भी पाठक को पैसे देकर जाती है। न्यूज पेपर वेंडर जोगिंदर सिंह ने बताया कि वह 50 वर्षों से निरंतर लोगों के घरों पर बिना रुके अखबार पहुंचा रहे हैं। एक दौर था जब परिवारों में चंपक, नंदन, चंदा मामा जैसी किताबें खूब पढ़ी जाती थीं। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान लोग जरूर पढ़ते थे। अब लोग सुबह उठते ही मोबाइल देखते हैं।


