हरिद्वार, 18 जुलाई। श्रावण कांवड़ मेला शुरू होने में अभी एक सप्ताह से अधिक का समय शेष है। लेकिन उससे पहले ही एक बहू के अपनी बेटी के साथ मिलकर वृद्ध सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के हापुड़ तक पैदल यात्रा कराने का दृश्य सामने आया है। यात्रा में पोती भी दादी की सेवा में कदम से कदम मिलाकर चल रही है। उत्तर प्रदेश के हापुड़ निवासी वृद्धा ऊषा देवी की लंबे समय से कांवड़ यात्रा और गंगा स्नान की इच्छा थी।
लेकिन उम्र अधिक होने के कारण उनके लिए पैदल यात्रा करना संभव नहीं था। परिवार में चार पुत्र होने के बावजूद उनकी बहू पिंकी ने उन्हें कांवड़ यात्रा कराने का फैसला किया और उन्हें लेकर हरिद्वार पहुंच गयी। हरकी पैड़ी पर गंगा स्नान कराने के बाद उन्होंने ऊषा देवी को विशेष रूप से तैयार की गई कांवड़ में बैठाया और पैदल यात्रा शुरू की। अपनी सास को कंधों का सहारा देकर हरिद्वार से हापुड़ तक का सफर तय कर रही पिंकी का कहना है कि सास की सेवा करना उनका कर्तव्य ही नहीं बल्कि सौभाग्य भी है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों के लिए जीवनभर त्याग करते हैं, उसी तरह बुढ़ापे में उनकी सेवा करना परिवार की जिम्मेदारी है। सास को कांवड़ यात्रा करा रही पिंकी को लोग आधुनिक श्रवण कुमार की संज्ञा दे रहे हैं। यात्रा में उषा देवी की पोती राधा भी पूरा साथ निभा रही हैं। पढ़ाई करने की उम्र में राधा अपनी दादी की सेवा में पूरी श्रद्धा के साथ जुटी हुई है। राधा अपनी मां पिंकी के साथ मिलकर कांवड़ को अपने कंधों का सहारा देने के साथ दादी पूरा ख्याल भी रखती है।
राहगीरों और श्रद्धालुओं का कहना है कि इतनी छोटी उम्र में ऐसे संस्कार और सेवा भाव दुर्लभ हैं। लोगों की नजरें स्वतः ही इस अनोखी कांवड़ यात्रा पर टिक जाती हैं। कई लोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं और उनका उत्साहवर्धन कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि कांवड़ यात्रा केवल जल लाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह सेवा, त्याग और समर्पण का भी प्रतीक है। पिंकी और राधा ने अपने व्यवहार से इस भावना को जीवंत कर दिया है।


